भ्रान्ति / सन्देह

जब इस्लाम मूर्तिपूजा के विरूद्ध हैं, फिर इसका कारण है कि मुसलमान अपनी नमा़ज में काबा की ओर झुकते हैं और पूजा करते हैं?

उत्तर :- ‘काबा’ किबला हैं अर्थात वह दिशा जिधर मुसलमान नमाज़ के समय अपने चेहरे का रूख करते हैं। यह बात सामने रहनी चाहिए कि यद्यपि मुसलमान अपनी नमाजों मे काबा की तरफ अपना रूख करते हैं लेकिन वे काबा की पूजा नही करते। मुसलमान एक अल्लाह के सिवा किसी की पूजा नहीं करते और न ही किसी के सामने झुकते हैं।

धर्म या विश्व राजनीति से संबंधित चर्चाओं में यह प्रश्न प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप् से मुसलमानों पर उछाला जाता हैं। मीडिया के किसी भी साधनों में मुसलमानों को बख़्शा नहीं जाता और इस्लाम तथा मुसलमानों के संबंध में बड़े पैमाने पर ग़लतफ़हमियॉ फैलार्इ जाती हैं, उन्हे कट्टरवादी के रूप् में दर्शाया जाता है। वास्तव मे ऐसी ग़लत जानकारियॉ और झूठे प्रचार अकसर मुसलमानों के विरूद्ध हिंसा और पक्षपात का कारण बनते हैं। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण अमेरिकी मीडिया द्वारा मुसलमानों के विरूद्ध चलाए जाने वाली मुहिम हैं जो ओकलाहोमा बस धमाके के बाद चलार्इ गर्इ। प्रेस ने तुरन्त यह एलान कर दिया कि इस धमाके के पीछे ‘मध्य पूर्वी “ाडयंत्र‘ काम कर रहा हैं। बाद में अमेरिकी सेना का एक जवान इस कांड में दोषी पाया गया ।

अब हम मुसलमानों के रूढ़िवादी और आतंकवादी होने के आरोपों का जायजा लेते हैं।

कुछ गै़र-मुस्लिम की यह आम शिकायत हैं कि संसार भर में इस्लाम के माननेवालों की संख्या लाखों में नही होती यदि इस धर्म को बलपूर्वक नहीं फैलाया गया होता। निम्न बिन्दु इस तथ्य को स्पष्ट कर देंगे कि इस्लाम की सत्यता, दर्शन और तर्क ही हैं जिसके कारण वह पूरे विश्व में तीव्र गति से फैला न कि तलवार सें।

1- इस्लाम का अर्थ शान्ति हैं
इस्लाम मूल शब्द ‘सलाम’ से निकला हैं जिसका अर्थ है ‘शान्ति’। इसका दूसरा अर्थ हैं अपनी इच्छाओं को अपने पालनहार खु़दा के हवाले कर देना। अत: इस्लाम शान्ति का धर्म हैं जो सर्वोच्च स्रष्टा अल्लाह के सामने अपनी इच्छाओं को हवाले करने से प्राप्त होती हैं।

इस्लाम में औरतों की जो स्थिति हैं, उसपर सेक्यूलर मीडिया का ज़बरदस्त हमला होता हैं। वे पर्दे और इस्लामी लिबास को इस्लामी क़ानून में स्त्रियों की दास की मिसाल के रूप मंय पेश करते हैं। इससे पहले कि हम पर्दे के धार्मिक निर्देश के पीछे मौजूद कारणों पर विचार करें, इस्लाम से पूर्व समाज में स्त्रियों की स्थिति का अध्ययन करते हैं।

1- भूतकाल में स्त्रियों का अपमान किया जाता और उनका प्रयोग केवल काम-वासना के लिए किया जाता था

इतिहास से लिए निम्न उदाहरण इस तथ्य की पूर्ण रूप से व्याख्या करते हैं कि आदिकाल की सभ्यता में औरतों का स्थान इस सीमा तक गिरा हुआ था कि उनकी प्राथमिक मानव सम्मान तक नही दिया जाता था।

अब मै आप को नागरिको के अधिकार बताना चाहता हूं। ये अधिकार उन अधिकारों से अधिक हैं जो अभी थोड़ी देर पहले मैं इन्सान की हैसियत से इन्सान के अधिकार बयान कर चुका हूं।

1- जान-माल की रक्षा

अल्लाह के रसूल (सल्ल0) ने अपने आखिरी हज़ के मौके पर जो तक़रीर की थी, उसमें फरमाया था कि तुम्हारी जाने और तुम्हारे माल एक दूसरे पर कियामत तक के लिए हराम हैं। ‘

जिहाद ही तरह जिज़्या को लेकर भी इस्लाम के विरूद्ध बड़ा दुष्प्रचार किया गया हैं और यह गलतफहमी उत्पन्न कर दी गर्इ हैं कि जिज्या का उद्देश्य भी कर-भारद्वारा गैर मुस्लिम को इस्लाम ग्रहण करने पर बाध्य करना हैं। हर प्रकार के इस्लाम-विरोधी प्रचार का स्रोत तो र्इसार्इ सम्प्रदाय हैं, परन्तु अंगे्रजो के शिष्या उनके चबाए ग्रास को चबानेवाले हमारे देश के विद्धानों ने भी जिहाद और जिज्या के प्रति बड़ा द्वेषपूर्ण प्रचार किया हैं। उन्ही विद्वानों में अंगे्रजी सरकार के सेवक तथा सम्मानित मुगल इतिहास के प्रसिद्ध इतिहासकार ‘सर यदुनाथ सरकार’ भी थे। उनकी एक हिन्दी पुस्तक ‘औंरगजेब’ हैं। यद्यपि वह हिन्दी नहीं जानते थें, परन्तु उन्ही की इच्छा के अनुसार उनके एक शिष्य ने उनकी अंगे्रजी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद कराके उनकी स्वीकृति के बाद उन्ही के नाम से प्रकाशित करार्इ हैं। किसी धर्म के विषय में प्रमाण उसी धर्म की पुस्तके हो सकती, है, विरोधियों, की लिखी हुर्इ पुस्तकें नही हो सकती, चाहे वह कितने बड़े विद्वान थे।

संसार के जिन सम्प्रदायों से इस्लाम को सबसे पहले वास्ता पड़ा वे यहूदी और र्इसार्इ सम्प्रदाय थें। यहूदियों की इस्लाम के केन्द्र मदीने के आस-पास बड़ी-बड़ी बस्तियां थी और उनका अरबों पर बड़ा प्रभाव था और र्इसाइयों के विशाल साम्राज्य का क्षेत्र मदीना निवासियों की सीमा तक फैला हुआ था और और उसके प्रभाव से लाखों अरब र्इसार्इ हो गए थें। सीमा प्रान्त में कुछ अरब रियासतों भी स्थापित हो गर्इ थी। यमन का नजरान प्रान्त र्इसाइयों का केन्द्र था।
यहूदी और र्इसार्इ अगर अपने-अपने धर्म का ठीक-ठीक पालन करते होते और अपने-अपने धर्मग्रन्थों के अनुसार चलते होते तो दोनो को मुसलमान होना चाहिए था, क्योकि इस्लाम के सिद्धान्त और इतिहास के अनुसार संसार के विभिन्न देशों और जातियों में जितने भी नबी, रसूल और र्इशदूत हुए थे, उन सबने इस्लाम ही की शिक्षा दी थी