इस्लाम के पाँच स्तंभ

एकेश्वरवाद

तौहीद (एकेश्वरवाद) :- और बंदे के बीच पैगम्बर को मार्गदर्शक मानता हैं। इस्लाम पुरोहितवाद को स्वीकार नही करता। वह किसी साकार सत्ता को उपासना का आधार नही बनाता जिसको मनुष्य अध्यात्मिक चिंतन के क्षणों में आराध्य की भांति बसाकर अपना सारा ध्यान शक्ति उस पर केंद्रित कर दें और उसमें तन्मय हो जाये। इसमें चित्र या मूर्ति जैसे किसी माध्यम की आवश्यकता नही हैं। ‘इस्लाम एक ऐसा दीन है जो विचारों की पवित्रता, चिंतन की ऊॅंचार्इ, संकल्प और इच्छा की निर्मलता, र्इश्वर के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं से विरचित,...

नमाज़

नमाज इस्लाम की रीढ़, दीन का स्तम्भ, मोक्ष की शर्त, र्इमान की रक्षक और पवित्रता की नीव हैं। दिन मे पॉच बार नमाज पढ़ने का आदेश हैं। यह निश्चित समय में ‘अल्लाह’ का स्मरण हैं। इस व्यवस्था का पालन करते हुए मुसलमान पॉच बार खुदा के सामने उपस्थित हो पाप-कर्म से बचने की प्रार्थना और सच्चार्इ के मार्ग पर अग्रसर होने की सामथ्र्य संचित करता हैं। यह सफलता की कुन्जी हैं। र्इश्वर की ‘इबादत’ का विधान हैं। नमाज प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह स्वतन्त्रता हो या दास,

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उनके लिए सनद...

रोज़ा

मनुष्य र्इश्वर की विलक्षण रचना हैं। यह शरीर और आत्मा का समन्वित रूप हैं। यदि आत्मा का प्रभाव शरीर की अपेक्षा अधिक हुआ तो मनुष्य सांसारिक जीवन से कट कर भगवद्भक्ति मे लीन हो जाता है और यदि शरीर को आत्मा की तुलना में अधिक महत्व दिया जाये तो मनुष्य ऐश्वर्य प्रेमी बन जाता हैं। अत: इस्लाम ने मनुष्य को इस दलदल से बचाने के लिए ‘रमजान’ माह के रोजे अनिवार्य कर दिए हैं। कुरआन शरीफ में मुसलमानों पर ‘रोजा’ फर्ज किया जाता गया हैं।1

ज़कात

इस विश्व मे मनुष्य की सुख-सुविधाओं के लिए र्इश्वर ने विभिन्न प्रकार की वस्तुएं निर्मित की हैं। विश्व की सम्पूर्ण वस्तुएं केवल मुट्ठी भर लोगो के अधिकार मे न रहे इसलिए उसने ऐसे नियम बना दिए हैं जिनका पालन करते हुए प्रत्येक मनुष्य आवश्यक और जीवनोपयोगी वस्तुओं को दूसरों तक पहुंचा सकें। यह विधि मनुष्यों मे परस्पर-प्रेम और त्याग की भावना को बल प्रदान करती हैं। इसके लिए इस्लाम मे जकात खुम्स,-खैरात और सदके का विधान हैं। इसके द्वारा मनुष्य का इहलोक और परलोक दोनों मे उद्धार होता हैं। इनमें से खैर-खैरात...

हज

‘हज्ज’ का अर्थ हैं तीर्थ-दर्शन करना। ‘हज्ज’ एक ‘इबादत’ हैं, जिस में मनुष्य अल्लाह के घर अर्थात कअब: के दर्शन करने की इच्छा से मक्का जाता हैं। ‘हज्ज-ए-बैत-उल्लाह’ र्इश्वर के प्रति अपार श्रद्धा, प्रेम, बंदगी और र्इश-प्रशंसा का द्योतक हैं। कअब: अल्लाह की इबादत का केन्द्र और शांति का स्थान हैं।1 परिस्थिति, अर्थ और स्वास्थ्य की दृष्टि से सम्पन्न व्यक्ति पर हज्ज फर्ज है।2 कुरआन में हज्ज के महत्व की व्यापक चर्चा की गर्इ हैं।3 कअब: दर्शन से अल्लाह के स्मरण के साथ बहुत सी विस्मृत घटनाएं जीवन के साथ पुन: जुड़...